Monday, 5 May, 2008

छोटी सी बात मुहब्बत की...

घर लौटते वक्त, कभी कोई काम करते समय या अनायास सड़क से गुजरते हुए... न जाने कितने सालों से यह गीत मैं गुनगुना उठता हूं. बहुत सादा से शब्दों वाले इस प्रेम गीत का न जाने क्या जादू है.. जो कभी खत्म नहीं होता. लगता है कि किसी के दिल से कोई बहुत सीधी-सच्ची सी बात निकली है और अपने दिल में उतर गई है.


इसके शब्दों की सादगी में कोई ऐसा जादू है कि आप बार-बार इसके करीब जाते हैं. हर बार करीब जाने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है जो खुलता नहीं.. कोहरे में छिपी हुई सुबह की तरह.. या बचपन की धुंधली यादों की तरह..

यह गीत है बड़ी बहन का.. संगीत तैयार किया है हुस्नलाल-भगतराम ने और गाया है सुरैया ने. इसे लिखा है क़मर ज़लालाबादी ने. जरा इसके शब्दों पर गौर करें-

वो पास रहें या दूर रहें नज़रों में समाये रहते हैं
इतना तो बता दे कोई हमें क्या प्यार इसी को कहते हैं


इसके बाद सिर्फ दो पंक्तियां और-

छोटी सी बात मुहब्बत की, और वो भी कही नहीं जाती
कुछ वो शरमाये रहते हैं, कुछ हम शरमाये रहते हैं

मिलने की घड़ियाँ छोटी हैं, और रात जुदाई की लम्बी
जब सारी दुनिया सोती है, हम तारे गिनते रहते हैं


है ना जादू.. बहुत बार सुनने के बाद भी इस गीत से उठने वाले भाव को मैं ठीक-ठीक अभिव्यक्त नहीं कर सकता. यह गीत किशोरवय के दौरान उदास गर्मियों की रातें या शामों की याद दिला जाता है. जब हम ठिठकते हैं.. हम जो अब तक खुद पर मुग्ध थे, किसी और के जादू से खिंचे चले जाते हैं... किसी अनजान आकर्षण की ओर... ठीक उसी तरह जैसे बचपन में हम पहली बार तारों से भरा आसमान देखते हैं या बारिश में भीगते हैं या इंद्रधनुष देखते हैं

'शरमाए रहना...','तारे गिनते रहना..' या फिर 'नजरों में समाए रहना..' यह एक खास 'स्टेट आफ माइंड' है. यह उस भाव को छूता है जब किसी का 'होना' हमारी जिंदगी को मतलब देने लगता है. हम उसकी निगाहों से खुद को देखने लगते हैं. शायद उसी वक्त हम प्रेम को नाम से नहीं अहसास के जरिए जानते हैं. तभी इस गीत में बड़ी मासूमियत से पूछा जाता है, 'इतना तो बता दे कोई हमें क्या प्यार इसी को कहते हैं..'

हिन्दी गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनका नैरेटर एक खास सिचुएशन में अपनी बात कह रहा होता है. यह सिचुएशन उस गीत की फिलॉसफी से लेकर उसका व्याकरण तक तय कर देती है. यहां वाक्यों की संरचना में 'रहते हैं..' आपके मन पर एक अजीब सा असर छोड़ता है. यह गीत को तत्काल की बात नहीं बनने देता है बल्कि इसके जरिए एक वातावरण बनता है. यह वातावरण है स्थितियों और भावनाओं का...

आप सुरैया के बाकी गीतों की तरफ बढ़ें तो कई और जादुई गीत सामने आते हैं. कुछ ही उदाहरण काफी होंगे.. 'सोचा था क्या, क्या हो गया..', 'तेरे नैनों ने चोरी किया..', 'तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी..' यह लिस्ट लंबी हो सकती है, फिलहाल तो आप यह गाना सुनिए..

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Wednesday, 30 April, 2008

कॉमिक्स और सिनेमाः फ्रेम-दर-फ्रेम

बीते दिनों चैनल जूम पर डायरेक्टर्स कट में शेखर कपूर का इंटरव्यू देखा. इंटरव्यू लेने वाले कबीर बेदी थे. जितने उत्साह से मैं देखने बैठा था, उस लिहाज से निराशा हुई. बहुत सतही से सवाल पूछे गए. जहां कहीं भी शेखर किसी मुद्दे पर खुलने को होते, सवालों का रुख बदल जाता.


बहरहाल शेखर ने इस बीच दो दिलचस्प बातें कहीं. पहली न्यू मीडिया (जो कि दरअसल इंडिपेंडेंट सिनेमा के बारे में ही था) और दूसरा कहानी सुनाने की अपनी सनक के बारे में... उन्होंने अपने कॉमिक बुक प्रोजेक्ट के बारे में भी विस्तार से बताने की कोशिश की. शेखर जो अपने ब्लाग में अक्सर दार्शनिक किस्म के सवालों से जूझते नजर आते हैं, हल्की-फुल्की कॉमिक विधा के प्रति उनकी दिलचस्पी मुझे अच्छी लगी. मुझे पिछले दिनों यह भी जानकर बहुत अच्छा लगा कि वाचोव्स्की ब्रदर्स (जिन्होंने मैट्रिक्स सिरीज की फिल्में निर्देशित कीं और बतौर लेखक-निर्माता वी फार वेंडेटा जैसी उम्दा फिल्म दी) ने अपने कैरियर की शुरुआत बढ़ईगिरी और बाद में कॉमिक बुक्स लिखने से की.

कॉमिक्स और सिनेमा के बीच प्रारंभ से ही मुझे गहरा नाता महसूस होता है. फ्रेम-दर-फ्रेम कहानी कहने की विधा कई बार सिनेमाई अवधारणाओं के बहुत करीब जाती है. खास तौर पर नैरेशन के बहुत से दिलचस्प तरीके मुझे कॉमिक्स से ही सीखने को मिले. यह मुझे फिल्म विधा के काफी करीब ले जाता है. हाल की कॉमिक्स पर अगर आप नजर डालें तो वहां तस्वीरों और उनके सीक्वेंस पर बहुत ध्यान दिया जाता है मगर उनमें वह बात नजर नहीं आती जो ली फॉक जैसे क्लासिक कॉमिक रचयिताओं ने अपनी कहानियों में बुना था.

बचपन में टाइम्स आफ इंडिया के सौजन्य से यानी कि होश संभालने से लेकर किशोर वय तक हमें इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ने को मिली. यह कहानियों का एक अंतहीन खजाना था. अफसोस कि मैं उस खजाने को लंबे समय तक सहेज कर नहीं रख पाया. मगर बीते दिनों मुझे एक ब्लाग देखने को मिला, जिसमें इंद्रजाल कॉमिक्स के तमाम पुराने अंकों को स्कैन करके प्रकाशित किया जा रहा है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शायद यह जानकर अजीब लगे मगर अपने अब तक के जीवन की सबसे पहली और सबसे गहरी स्मृतियों को याद करने की कोशिश करता हूं तो मुझे अपने जेहन में कॉमिक्सों की कुछ तस्वीरें कौंधती हैं.


मुझे याद है इंद्रजाल कॉमिक्स ने फैंटम, मैंड्रेक और फ्लैश गार्डेन के अलावा कुछ और किरदार भी प्रकाशित किए. ये ज्यादातर अमेरिकन और यूरोपियन कॉमिक्स कैरेक्टर थे. इन्हें किंग फीचर्स सिंडीकेट के सौजन्य से प्रकाशित किया जाता था. आम तौर पर ये चरित्र एक आम आदमी से होते थे. अमेरिका के सार्वजनिक और निजी जीवन की झलक उनमें खूब देखने को मिलती थी. किसी बेहतर पटकथा की तरह इनकी स्टोरी लाइन काफी अहम होती थी.

धीरे-धीरे मुझे यह महसूस हुआ कि अगर कॉमिक्स की शैली का गहरा अध्ययन किया जाए तो सिनेमाई नैरेशन बुनने में काफी मदद मिल सकती है. इतना ही नहीं कॉमिक्स का हर फ्रेम कैमरे की तरह एक खास एंगल लिए होता है और उस एंगल से बहुत सी बातें निर्धारित होती हैं. मुझे ऐसे हजारों स्केचेज याद हैं जिनके खास एंगल कॉमिक्स की कहानी मे एक अंडरकरेंट पैदा करते थे. उदाहरण के तौर पर अक्सर कोई खूबसूरत लड़की अगर हमारे नायक को सेड्यूस करने का प्रयास करती थी तो पूरे फ्रेम पर हम उसके खूसबसूरत पांवों को (अक्सर मोजे पहनते या अपनी सैंडिल ठीक करते) देखते थे और पार्श्व में नायक नजर आता. ली फॉक स्थितियों के दुहराव से एक अजीब किस्म की नाटकीयता रचते थे.


मैंने अपने बचपन में कभी भारतीय कॉमिक्स नहीं पढ़ी. मुझे याद है कि उसी दौरान शुरु होने वाले कैरेक्टर्स चाचा चौधरी, फौलादी सिंह और राजन-इकबाल का हम लोग मजाक बनाया करते थे. हालांकि अमर चित्र कथा के साथ ऐसा नहीं था मगर मुझे अमर चित्र कथा में पंचतंत्र की कहानियां छोड़कर उससे कभी ज्यादा लगाव नहीं हो सका. जो विदेशी कॉमिक्स पढ़ी (शायद वह हिन्दी में विदेशी कॉमिक्स के प्रकाशन का सबसे सुनहरा दौर था) उनमें विश्व के करीब सभी प्रमुख कॉमिक ट्रेंड्स से हम परिचित हो गए थे. इनमें प्रमुख थे द्वितीय विश्व युद्द की पृष्ठभूमि पर बनी कमांडो, वाल्ट डिज्नी के कैरेक्टर मिकी माउस, डोनाल्ड, डीसी कॉमिक्स के सारे सुपर हीरो, स्पाइडर मैन, स्टार वार्स और स्टार ट्रैक जैसी फिल्मों पर आधारित कॉमिक्स, लगभग उपन्यास की शक्ल लिए एस्ट्रिक्स, लकी ल्यूक और टिनटिन के कॉमिक, विदेशों से आयातित कॉमिक्स और सदाबहार इंद्रजाल कॉमिक्स के कैरेक्टर...


हालांकि जब भी मैंने कॉमिक्स पर आधारित फिल्में देखीं, मुझे निराशा ही हाथ लगी. मैंने सबसे पहले इस तरह की फिल्म स्पाइडर मैन स्ट्राइक्स बैक देखी थी. इसके बाद हल्क (पुरानी, हाल ही में नई देखी) देखी. दोनों ही फिल्में बहुत साधारण थीं. सिवाय इसके कि स्पाइडर मैन में बिकनी मे सजी एक लड़की पूरी फिल्म में नजर आती है और हल्क की नायिका जंगल में नहाते वक्त खुद को टॉपलेस दिखा जाती है. बाद में सुपरमैन सिरीज की फिल्में देखीं और सुपरगर्ल से खासा इंप्रेस रहे. मगर इसके पीछे तकनीकी जादू और स्पेशल इफेक्ट से पैदा होने वाला चमत्कार ज्यादा था. कॉमिक्स अपने नैरेशन में जिस गहराई तक मुझे ले जाते थे उसके मुकाबले में ये फिल्में मुझे बहुत सतही जान पड़ती थीं. मुझे लगता है कि अगर मैं उनकी तकनीकी बारीकियों पर लिखने लगूं तो एक ब्लाग कम पड़ जाएगा...

तो इस बारे में फिर कभी...

Monday, 17 March, 2008

दक्षिण का सिनेमा













बैंगलोर के शुरुआती महीनों में वीडियो कोच वाली बस से सफर करते हुए बहुत सी दक्षिण भारतीय फिल्में देखते वक्त कटा. दक्षिण के सिनेमा ने अपनी एक खास सिनेमाई भाषा विकसित कर ली है. यहां तक कि उनका व्यावसायिक सिनेमा भी हिन्दी सिनेमा के मुकाबले ज्यादा भारतीय किस्म का सिनेमा है. वैसे दक्षिण के सिनेमा से मेरा परिचत कोई नया नहीं है. नब्बे के दशक में दूरदर्शन भारतीय भाषाओं की फिल्में दिखाया करता था. (शायद आज भी दिखाता हो...) मैंने दक्षिण की पहली फिल्म निंजरे किल्लते देखी. यह तमिल भाषा की फिल्म थी और सुबह दौड़ने के लिए जाने वाली एक शांत स्वभाव की लड़की के जीवन में आते-जाते उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्त करती थी.

बाद में दक्षिण के जिस अहम निर्देशक के बारे में मैने जानना शुरू किया वह थे अदूर गोपालकृष्णन और जी अरविंदन. अदूर की फिल्म मुखामुखम (फेस टू फेस) की पटकथा मैंने अंग्रेजी में पढ़ी थी. उनकी इसी फिल्म के बारे में काफी कुछ पढ़ा भी. उसके बाद मत्तिलुकल (द वाल्स) में अपनी गहन संवेनशीलता के चलते अदूर एक बार फिर जबरदस्त चर्चा का विषय बने. जी अरविंदन की सिने भाषा और अमूर्तन को लेकर किए गए उनके प्रयोगों के बारे में मैने बहुत कुछ पढ़ रखा था मगर मुझे उनकी सिर्फ दो फिल्में देखने का मौका मिला. एक फिल्म सर्कस के जीवन पर थी और दूसरी एक गांव में कथकली नर्तकों के ऊपर बनाई गई थी.


इस दौरान किशोर वय में अचानक सिनेमाहालों में दक्षिण के निर्देशकों और अभिनेताओं की फिल्मों का मानों सैलाब सा आ गया था. काफी बनावटीपन और मसाला होने के बावजूद इन फिल्मों के कथ्य और राजनीतिक तेवर ने मुझे आकर्षित किया. मुझे नहीं लगता कि किस्सा कुर्सी का और आंधी को छोड़कर किसी उत्तर भारत के निर्देशक ने राजनीतिक तेवर वाली फिल्म बनाने का साहस किया होगा. जबकि मुझे अच्छी तरह से याद है कि बहुत सतही तौर पर व्यवस्था की आलोचना करने वाली फिल्म मेरी आवाज सुनो उस समय आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई थी. इस फिल्म के निर्देशक एसवी राजेंद्र सिंह की बनाई फिल्म शरारा और मेरा फैसला भी मुझे काफी पसंद आई. उनकी फिल्मों में लगातार चेजिंग जैसा माहौल और स्थितियों को खींचने की उनकी कला वास्तव में काबिले-तारीफ थी. हालांकि मुझे पता है कि अब उनकी फिल्में मैं देखुंगा तो वह ज्यादा पसंद नहीं आएंगी.

इसी दौरान व्यवस्था, कानून और राजनेताओं का माखौल उडा़ने वाली कई और दक्षिण की फिल्में आईं, लगभग सभी को मैंने बड़े चाव से देखा. इनमें अमिताभ बच्चन की इनकलाब, रजनीकांत की मेरी अदालत और अंधा कानून तथा राजेश खन्ना की आज का एमएलए रामअवतार जैसी फिल्में शामिल थीं. कहने की जरूरत नहीं कि इन फिल्मों ने जिस तेवर के साथ व्यवस्था की आलोचना की थी, उसी ने इन फिल्मों को हिट भी बनाया था. इस दौरान दूरदर्शन पर गहरी सामाजिक-राजनीतिक चेतना वाली दो फिल्मों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया. के बालाचंदर की जरा सी जिंदगी और एक नई पहेली काफी अंडररेटेड फिल्में रहीं, मगर मेरे ख्याल से इन फिल्मों में बहुत तीखे किस्म के सामाजिक-राजनीतिक तेवर देखने को मिलता है. उसी दौर में दूरदर्शन पर आई के बालाचंदर की अकाल पर बनी एक फिल्म (नाम भूल गया है) तो उस दौर में श्याम बेनेगल और मृणाल सेन के कलात्मक सिनेमा के स्तर को छूती थी.

इस बीच मुझे आईवी शशी की एक फिल्म अनोखा रिश्ता देखने को मिली. बड़ी उम्र के व्यक्ति को चाहने वाली लड़की की यह करीब 20 साल पहले आई कहानी इस दौर की निःशब्द और चीनी कम से कहीं ज्यादा परिष्कृत लगती है. इस बीच दक्षिण की फिल्में और ज्यादा परिष्कृत होती गईं... और लगभग हतप्रभ करने वाले कौशल के साथ मणिरत्नम की फिल्में सामने आईं. यह दक्षिण भारत की फिल्मों का एक अलग दौर था, जिसमें मणिरत्नम, शंकर, और कथीर जैसे निर्देशक सामने आए. खास तौर पर मणितत्नम और शंकर ने तो पॉपुलर सिनेमा की शैली में गंभीर बात करने की एक सर्वथा नई शैली ही विकसित कर डाली... इसके बारे में मैं कभी विस्तार से लिखना चाहूंगा.

दक्षिण के सिनेमा में जो मुझे खास बात दिखती है वह ये है कि उन्होंने कहानी कहने की अपनी सर्वथा मौलिक शैली विकसित की. खास तौर पर उनके संपादन की शैली अद्भुत होती है और बहुत सी फिल्मों के दृश्यों को विश्व सिनेमा के स्तर पर रखा जा सकता है. चाहे वो सागर संगमम और एक दूजे के लिए में कमल हासन के तीव्र नृत्य के दौरान का संपादन हो या फिर महानदी में कमल हासन को भीड़ द्वारा पीटे जाने का दृश्य या स्वाति मुत्यम में महापूजा के दौरान दिमागी रुप से कमजोर कमल हासन का एक विधवा की मांग में सिंदूर भरने का दृश्य हो. संपादन में एक नृत्य के समान रिदम पैदा करना दक्षिण के सिनेमा में ही देखने को मिलता है.

दूसरी सबसे बड़ी खूबी यह है कि दक्षिण के अच्छे निर्देशकों ने प्रकृति की सुंदरता के फिल्मांकन की जितनी भी संभावनाएं हो सकती हैं उन्हें एक्सप्लोर करने का प्रयास किया है. उनकी फिल्मों मे उच्च तकनीकी दक्षता के साथ ही वहां के रहन-सहन, वहां के गांव, उनका पहनावा और परंपराओं तथा रीति-रिवाज बड़े ही सुंदर तरीके से देखने को मिलते हैं. यानी कि विश्व सिनेमा के लिए वह विशुद्ध भारतीय फिल्मों का बाजार तैयार कर सकती हैं.

Monday, 3 March, 2008

लो दिल की सुनो दुनिया वालों...


सिनेमा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपने आसपास भी एक खूबसूरत सा रचनात्मक संसार रचता हुआ चलता है. मेरे बचपन में ग्रामोफोन के रिकार्ड्स बिक्री और लोकप्रियता के मामले अपने चरम पर पहुंचकर आहिस्ता-आहिस्ता विलुप्त हो गए. मगर अवचेतन में उनके खूबसूरत कलात्मक कवर और उनसे उठता संगीत कहीं गहरे तक धंस गया है. तकनीकी रूप से मुझे आज भी रिकार्ड के साउंड की बराबरी करने वाला कोई भी माध्यम नहीं लगता. जिन्होंने कई-कई घंटे रिकार्ड प्लेयर से उठती-गिरती उस धुन को सुना होगा उन्हें शायद मेरी बात से अचरज नहीं होगा. हमारे रिकार्ड एक अलग सा संसार रचते थे. हमारी ग्रामोफोन से इस कदर दोस्ती हो गई थी कि मुझे आज भी याद है, जब कभी शुरुआत या अंत की किसी लाइन को दोबारा सुनना होता था तो हम रिकार्ड पर पड़ी बारीक सी लाइनें गिनकर बिल्कुल वहीं से गाना चला देते थे जहां से हमें चाहिए होता था.

इलाहाबाद में मेरे घर में एचएमवी का फियेस्टा पापुलर माडल था. बहुत बाद में उसे मैंने उदय प्रकाश के घर पर दिल्ली में देखा. यह दरअसल एचएमवी वालों का एक पोर्टेबल माडल था. उसके बाद एक और थोड़ा ज्यादा स्टाइलिश माडल आया और फिर रिकार्ड प्लेयर दिखने बंद हो गए. बचपन में मैं कुछ हैरत से शानो-शौकत वालों के घर में आटोमेटिक रिकार्ड चेंजर भी देखा करता था. गाना खत्म होते ही सुई अपने-आप स्टैंड पर वापस चली जाती थी. उपर से एक रिकार्ड टपकता था. सुई दोबारा बिल्कुल स्टार्टिंग प्वाइंप पर पहुंच जाती थी. एक बार गांव जाने पर मिशनरी की ओर से बांटा गया एक रिकार्ड और उसे हाथ से चलाने वाली गत्ते की मशीन मिली थी. फोल्ड किए गए गत्ते के स्टैंड को खोलकर हम उसमें रिकार्ड फिट करते थे और उसके ऊपर सुई रखते थे. रिकार्ड में एक स्टिक फंसाकर हाथ से तेजी से घुमाते थे तो आवाज निकलती थी. उसमें भोजपुरी में एक किस्सा बयान किया गया था- किस्से का टाइटिल था भुलाइल भेड़...

राजकपूर की फिल्म आवारा से मेरा सबसे पहला परिचय रिकार्ड के जरिए हुआ. कई साल तक मैं फीके लाल रंग के कवर पर बने बढ़े नाखून वाले उन दो पैरों को देखता रहा था. मुड़े हुए पांयचे में एक तस्वीर- राज और नरगिस अपनी सेंसुअस निकटता में... कवर के पीछे आवारा का फेमस ड्रीम सीक्वेंस था. मुझे वह हमेशा से बड़ा रहस्मय सा लगता था. आवारा, गाइड, अनमोल घड़ी जैसी न जाने कितनी फिल्में थीं जिनके गाने सुन-सुनकर और कवर पर तस्वीरें देखकर मैं उन फिल्मों की कहानी के बारे में कयास लगाया करता था और अपनी कल्पना के रंग भरता जाता था. कुछ फिल्में मैंने आज भी नहीं देखीं मगर उनके सिलसिलेवार गीत एक कहानी बनकर मेरे अंधेरे जेहन में उसी तरह की लकीरों में अंकित हो चुके हैं जैसे रिकार्ड्स की रेखाएं... फिल्म माया का गीत जा रे.. जा रे उड़ जा रे पंक्षी, बहारों के देश जा रे... या फिर कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिलवाला... अनमोल घड़ी के गीतों को मैं कैसे भूल सकता हूं... सोचा था क्या, क्या हो गया, क्या हो गया... मेरे बचपन के साथी मुझे भूल न जाना... और फिर गाइड की दिल में उतरती धुनें... वहां कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहां... दिन ढल जाए, हाए रात न जाए...

ग्रामोफोन कंपनियां रिकार्ड के कवर को खास तरह से सजाया करती थीं. रिकार्ड की दुकानों पर मेरा बहुत कम जाना होता था, मगर वह किसी जादुई संसार में कदम रखने जैसा था. दीवारे छत तक उनसे अटी होती थीं. लेटेस्ट फिल्में- यानी रॉकी, कुरबानी, शान, याराना, मिस्टर नटवरलाल से लेकर नाजिया और जोएब हसन का पॉप अल्बम तक वहां सजा दिखता था. मेरी मां को ब्लड प्रेशर की बीमारी थी. कभी वे तनाव में होती थीं तो काम जल्दी निपटाकर घर की सारी बत्तियां बुझाकर वे बिस्तर पर लेट जाती थीं. वे मुझे गाने लगाने को कहती थीं. अंधेरे में हम चुपचाप सुनते रहते थे, किशोर कुमार, मन्ना डे, तलत महमूद और मां के फेवरेट मुकेश को. जब हेमंत कुमार की आवाज स्पीकर से उठती थी, लो दिल की सुनो दुनियां वालों, या मुझको अभी चुप रहने दो... तो मेरे लिए जैसे समय ठहर जाता था. रात रुक जाती थी. घड़ी की सुइयां धीमी पड़ने लगती थीं. अंधेरे से भी कहीं ज्यादा गहरे मन के अंधेरे में ध्वनियां धीरे-धीरे चित्रों में बदलने लगती थीं.

और शायद इसीलिए मैं सोचता हूं, सृजन एक समानांतर संसार नहीं है. यानी आपके जीवन को विस्तार देता एक और जीवन... कभी आप भी सोचिए.

Thursday, 13 December, 2007

किस्सा-ए-बॉलीवुडः गतांक से आगे


एंपायर स्ट्राइक्स बैक जैसे साइंस फिक्शन और फ्लैश गार्डेन और स्पाइडर मैन स्ट्राइक्स बैक जैसी कॉमिक चरित्रों पर आधारित फिल्मों के बाद उम्र का वह दौर आया जब हम- यानी मैं और मेरे साथी वयस्कों की दुनिया में कदम रख रहे थे. हमारी उम्र थी करीब 16-17 बरस... उस दौर में ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी पर पुरानी फिल्में देखने, जून की तपती दोपहर में साइकिल दौड़ाने तथा शाम को हल्की उमस के बीच कुछ दोस्तों के साथ अंग्रेजों के जमाने में बने सीनियर इंस्टीट्यूट के हॉल में बैडमिंटन खेलने के अलावा टाइम पास का कोई साधन नहीं था.

ब्रुक शील्ड्स हॉलीवुड की वह पहली अभिनेत्री थी जिसे मैं पहचानता था. एंडलेस लव वह पहली फिल्म थी जिसके वयस्क संसार में हमने पसीने से भीगी मुट्ठी में टिकट भींचे धड़कते दिल के साथ कदम रखा था. सहारा और द ब्लू लैगून ने हमें ब्रुक शील्ड्स का फैन बना दिया. उन दिनों शहर के छोर पर एक पुराने से सिनेमाहाल में सुबह के शो में अंग्रेजी फिल्में लगा करती थीं. खास बात यह थी वहां फिल्मों का सेलेक्शन बहुत अच्छा था. वहां पर मुझे बेन हर, मैड मैक्स, एलियंस, ब्लेड रनर से लेकर जैकी चान तक की फिल्में देखने का मौका मिला.

अक्सर गिनती के 15-20 आदमी फिल्में देखने जाया करते थे. साइकिल स्टैंड वाले से हम नफरत करते थे क्योंकि उसे कोई बीमारी हो गई थी उसकी उंगलियां और नाक गलती जा रही थी और वह उन पर पट्टियां बांधे रहता था. भीतर हाल बहुत पुराना सा था और बहुत सी कुर्सियां टूटी हुई थीं. हम एक खास जगह चुनकर बैठते थे. वहीं पर मैंने डाइ हार्ड और एस्केप फ्राम न्यूयार्क भी देखी. एक फिल्म जिसे अब बहुत कम याद किया जाता है सुपरगर्ल- का जादू हम पर लंबे समय तक छाया रहा. उसकी नायिका हेलेन स्लाटर के तो हम फैन बन गए थे.

वहीं पर हमने काऊब्वायज़ के एक्शन देखे और चाइना और हांगकांग की धरती पर नृत्य कला जैसे मार्शल आर्ट वाली फिल्में भी. कई बार कुछ कम प्रचलित फिल्में सुबह नौ बजे के शो में भी लग जाया करती थीं. उसके ठीक बाद एक और अंग्रेजी फिल्म उसके बाद से पौने एक बजे हिन्दी फिल्म शुरू होती थी. कई बार हम दोनों अंग्रेजी फिल्मों का टिकट खरीद लेते थे और पहली फिल्म खत्म होने के बाद हॉल में बैठे रहते थे. बेन हर फिल्म देखने के लिए हमें सुबह साढ़े आठ बजे सिनेमाहाल पहुंचना पड़ा था.

भाषा अक्सर आड़े आती थी. परिवेश भी अनजाना था और उंगली पर गिने जाने लायक अभिनेताओं को हम पहचानते थे. इसके बावजूद कई छवियां आंखों से होती मन में और मन से होती अतीत होती किसी अंधेरी गुफा में भीत्ति चित्र की तरह कैद हो गई हैं....

Tuesday, 11 December, 2007

अतीत के कुछ और चलचित्र या किस्सा-ए-हॉलीवुड


अभी सलीमा की एक ताजा प्रविष्ठि में हमारे वरिष्ठ फिल्म समीक्षक प्रमोद सिंह ने अतीत के प्रति मुग्ध होकर देखने के खतरों के प्रति चेताया भी मगर उसके बावजूद मैं उन पुरानी फिल्मों के जादू से छुटकारा नहीं पा सका हूं. मुझे पता है कि आज मेरी संवेदना का स्तर दोबारा देखे जाने पर उन फिल्मों को काफी बचकाना मानेगा. जिस सिंदबाद एंड द आइज़ आफ टाइगर को मैं नौ साल की उम्र में हतप्रभ होकर देखता और स्वप्न बुनता था, दोबारा देखने पर वह सिर्फ बचकाने कैमरा ट्रिक वाली फिल्म लगी.

मगर हॉलीवुड का लार्जर दैन लाइफ सिनेमा मुझे बचपन से ही चकित करता रहा. अस्सी के दशक में इलाहाबाद में खूब अंग्रेजी फिल्में लगा करती थी. बचपन में परिवार के साथ सिनेमा देखने जाते समय हॉलीवुड की फिल्मों के पोस्टर और ट्रेलर मानो हमारे सामने कोई दूसरी दुनिया ही खड़ी कर देते थे, जो ज्यादा रोमांचक और उत्सुकता जगाने वाली थी. मुझे सिनेमा हॉल के कॉरीडॉर में लगे रिटर्न आफ दि ड्रैगन, द बीज़, द लीगेसी, नार्थ बाई नार्थ वेस्ट जैसी फिल्मों के पोस्टर आज भी याद हैं. उस वक्त हॉलीवुड शब्द हम मिडिल क्लास के लिए अनजान था, हम उसे अंग्रेजी या पश्चिमी सिनेमा के नाम से ही जानते थे. हाथ में गन और मुंह में सिगार लिए मर्दाना हीरो और अर्धनग्न सुंदरियों की यह एक अलग दुनिया थी.

उन दिनों वहां के अखबारों में अंग्रेजी फिल्मों के बहुत बड़े-बड़े विज्ञापन छपा करते थे. मुझे याद है मैकेनाज़ गोल्ड इलाहाबाद में लगी थी तो आधे पेज का एड प्रकाशित हुआ था. मैंने पहली कायदे की कोई अंग्रेजी फिल्म जो देखी वह थी स्टीवेन स्पिलबर्ग की क्लोज एनकाउंटर्स आफ दि थर्ड काइंड... इसके बारे में मैंने थोड़ा बहुत पत्रिकाओं में पढ़ भी रखा था. यह शायद मेरी पहली साइंस फिक्शन थी, उसे देखना लगभग अंतरिक्ष की सैर करने जैसा ही था. तो उत्सुकता से धड़कते दिल से जब मैं यह फिल्म देखने पहुंचा तो अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझ रहा था. इसके बाद देखी एंटर दि ड्रैगन, फ्लैश गार्डेन और स्टार वार्स सिरीज़ की फिल्में...

उन दिनों अंग्रेजी सिनेमा देखने वाला एक खास वर्ग हुआ करता था. एक खास किस्म का एलीट क्लास... सिर्फ पैसे वाला नहीं कुछ इंटेलेक्चुअल भी... सिनेमा के साथ उन्हें देखना भी दिलचस्प होता था. अखबारों में तब अंग्रेजी फिल्मों के बारे में कुछ खास नहीं निकलता था मगर भाई से सुन-सुनकर और कुछ पत्रिकाओं में पढ़ कर सीन कॉनरी, जीन पॉल बेलमांडो (ज़्यां पॉल बेलमोंदो), जॉन सैक्सन, ब्रूस ली और जॉन ट्रैवेल्टा (जॉन ट्रवोल्‍टाः सही उच्चारण बताने के लिए प्रमोद जी को आभार) को जान गया था.

अभी बस इतना ही... बाकी किस्सा-ए-हॉलीवुड की अगली कड़ी में..

Tuesday, 20 November, 2007

अतीत के चलचित्र


कभी निर्मल वर्मा ने यह उपन्यास के सिलसिले में कहा था कि एक अच्छे उपन्यास की पहचान यह होती है कि उन शब्दों में बसा जीवन हमारे खुद के जीवन में उतर आता है. क्या यह सिनेमा का भी सच नहीं है? सिनेमा उतना ही मेरी यादों में बसा है, जितनी कि मेरे वास्तविक जीवन की छवियां... प्रोजेक्टर के पीछे से झिलमिलाती रंगीन रोशनियां आती-जाती सांसों में बस चुकी हैं.

बचपन में एक फिल्म देखी थी, संजीव कुमार की उलझन... नायिका से अनजाने में शादी की रात एक कत्ल हो जाता है, शादी के बाद कातिल की तलाश का काम उसके पति को सौंप दिया जाता है. इसका एक गीत मेरे मन पर छाया रहा.. मुझको तो बस कातिल की इतनी पहचान है, भोला-भाला चेहरा है दिल बेइमान है... ऐसे तमाम गीत बचपन में मन में छाए रहे. प्रेम का रोग बड़ा बुरा..., चल सन्यासी मंदिर में..., परदेसिया... आज जब ये गीत बजते हैं तो मन में कौंध उठती हैं बरेली की गलियां, सन्यासी और जय संतोषी मां के गीतों की धुन पर घरों में नृत्य करती नन्ही बच्चियां, बनारस की बारिश से भीगी सड़क और किसी दुकान पर रेडियो पर बजता मिस्टर नटवरलाल का वह गीत. कुछ धुनों के साथ बिंब मन में कैद हो चुके हैं.

किशोरावस्था के रूखी बयार जैसे दिनों में भी हर सिनेमा किसी खास याद से जुड़ा है. एक फिल्म थी धर्म और कानून. देखा तो बहुत बुरी लगी... पर लगता है अंतिम सांसों तक याद रहेगी... शहर के बाहरी छोर पर बसे सिनेमा हाल में घटी दरों पर लगी इस फिल्म को जब देखने गया था तो इतनी बारिश हुई थी कि लगा आसमान फट पड़ा है... लौटते समय हम बुरी तरह भीग गए थे, मेरे दोस्त ने सुझाया- घर जाते ही अदरक वाली चाय पी लेना.. नहीं तो बीमार पड़ जाओगे. सिनेमा और बारिश का शायद मुझे खासा रिश्ता रहा है. बचपन में कोई भोजपुरी फिल्म देखने गया तो इतनी जबरदस्त आंधी आई थी कि हाल के भीतर छत का कोई टुकड़ा टूट कर गिर गया और अंधेरे में मैं घबराकर रोने लगा. राजा-जानी देखने गए तो इंटरवल में बार झांकने पर पता चला कि इतने काले बादल घिर आए थे कि बाहर लोगों ने अपने दुकान की बत्तियां जला ली थी और फिल्म खत्म हुई तो बाहर सड़क पर घुटनों तक पानी लगा था.

बारिश, सिनेमा और यादों की एक किश्त है... फिल्म थी नाम, उम्र होगी कोई 17 बरस, दोस्त एडवांस टिकट खरीदकर लाया था. मगर ग्यारह बजे से ही जो पानी बरसने लगा तो थमने का नाम ही नहीं लिया. हम रेलवे कालोनी में एक मकान के दरवाजे के बार इंतजार करते रहे. पहले मन बनाया था कि फिल्म छोड़ दी जाए. आखिर में तय किया कि नहीं चलते हैं. भीगते हुए गए. फिल्म शुरू हुए आधे घंटे से ऊपर हो चुका था. पानी टपकाते हुए घुसे तो आसपास बैठे लोग भी चिड़चिड़ाने लगे. मगर मजे से कमीज के सारे बन खोलकर फिल्म देखने बैठे. फिल्म देखी तो मैं स्तब्ध रह गया. कोई कामर्शियल फिल्म एक सधी हुई कहानी के साथ, गहरे अंडरकरेंट वाले डायलाग, अच्छा अभिनय और भी बहुत कुछ ऐसा जो अब तक हम व्यावसायिक सिनेमा में देखने की उम्मीद नहीं करते थे. उस दिन के बाद से मैं काफी समय तक महेश भट्ट का फैन रहा, हालांकि उस वक्त तक मैंने उनकी इससे पहले आई अर्थ और सारांश फिल्म नहीं देखी थी.

थोड़े और युवा हुए तो कयामत से कयामत तक और मैंने प्यार किया की गुनगुनाती धुनों पर जिंदगी की ट्यून सेट करने की असफल कोशिश करते रहे. परिंदा के पोस्टर देखकर हैरान हुए और जब फिल्म देखी तो उसका असर इस कदर दिमाग पर छाया रहा कि कम से कम उसे तीन-चार बार सिनेमा हाल में देखा होगा. अक्सर हम घटे दरों पर सिनेमा देखते थे. क्योंकि हमारी जेब को वही रास आता था. हालांकि पहला दिन पहला शो देखनी की दीवानगी भी कम नहीं थी. घटे दरों की फिल्में अक्सर उपेक्षित, पुराने, टूटी कुर्सियों और खराब प्रोजेक्टर पाले सिनेमा हालों में लगा करती थीं, जिनकी दीवालें पान की पीक से अक्सर बदरंग होती थीं. गेट पर एक मुश्टंडा सा