Friday 4 September 2009

'सेंसुअस साउथ'


दक्षिण भारतीय सिनेमा को लेकर उत्तर भारतीयों के मन में बहुत से पुर्वग्रह हैं। मसलन वे अविश्वसनीय होती हैं। उनमें काफी हिंसा होती है। तड़क-भड़क वाली पोशाकें और भड़कीले नृत्य होते हैं। कुल मिलाकर यह तस्वीर काफी हद तक सही भी बैठती है। इन टाइप्ड इमेजेज के साथ दक्षिण के सिनेमा की सोशियोलॉजिकल स्टडी काफी दिलचस्प हो सकती है। यहां यह भी गौर करने लायक बात है कि दक्षिण के सिनेमा ने उत्तर भारत पर भी खूब राज किया है। बी-ग्रेड डब की गई फिल्में छोड़ दें तो श्याम-श्वेत जमाने की फिल्म कंपनी जेमिनी की हिन्दी फिल्मों ने रिकार्ड बिजनेस किया और भारतीय मध्यवर्गीय घरों में ये फिल्में काफी पॉपुलर भी रही हैं।

मेरे बचपन में चंदामामा प्रकाशन वाले बी नागी रेड्डी की पारिवारिक फिल्में भी काफी हिट होती थीं। यह सब कुछ एक अलग से विमर्श का विषय हो सकता है मगर एक बात में मुझे दक्षिण बहुत मौलिक लगता है, भले वह कभी चर्चा का विषय न बना हो, वह है दक्षिण भारतीय फिल्मों का सेंसुअस होना। यह आश्चर्यजनक रूप से कूल और परंपरावादी दक्षिण भारतीय समाज के विपरीत छवि है। दक्षिण के निर्देशकों के पास न सिर्फ अपनी नायिकाओं को ज्यादा ऐंद्रिक ढंग से सामने लाने का सलीका है बल्कि प्रेम दृश्यों में भी वे दिलचस्प कल्पनाशीलता दिखाते हैं, जो कम से कम हॉलीवुड से प्रेम दृश्यों को कॉपी करने वाली हिन्दी फिल्मों के निर्देशकों के पास नहीं है।


यहां तक कि जिन फिल्मों को मीडिया में जबरन 'हॉट' और 'सेंसुअस' कहकर प्रचारित किया जाता है, वे दर्शकों के बीच ज्यादा पॉपुलर नहीं हो पाती हैं। इनमें मर्डर, जिस्म और ऐतराज जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है। मर्डर में इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत के बीच एक प्रेम दृश्य को देखकर किसी समीक्षक ने लिखा था कि 'फिल्म की नायिका पार्किंसन की मरीज लगती है'। मुझे याद है बहुत साल पहले प्रीतीश नंदी के संपादन में निकलने वाली टाइम्स ग्रुप की मैगनीज 'द इलेस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया' ने भारतीय सिनेमा में सेक्स और सेंसुअसनेस के इतिहास को समर्पित एक पूरा अंक ही निकला था। अपने कंटेंट और प्रस्तुतिकरण के लिहाज से वह एक असाधारण अंक था।

उसी अंक से यह पता चलता है कि व्ही शांताराम ने अपनी फिल्मों में असाधारण रुप से कलात्मक ऐंद्रिक दृश्य रचे थे। इसके बाद कलात्मकता के नजरिए से अगर किसी का नाम लिया जा सकता है तो वह निर्विवाद रूप से राजकपूर का होगा। मगर उसके बाद शायद ही कोई निर्देशक ऐसा हो जिसकी फिल्में आप उनकी गहरी ऐंद्रिकता और उसके कलात्मक चित्रण के कारण याद रख सकें। पुरानी फिल्मों में सहसा 1975 में आई एक फिल्म का नाम कौंधता है, वह थी जूली। मगर वह भी दक्षिण के एक निर्देशक केएस सेतुमाधवन की थी। अपने समय के लिहाज से फिल्म में विषय वस्तु का ट्रीटमेंट काफी बोल्ड था। फिल्म अनकहे ही सेक्स जैसे विषय के इर्द-गिर्द घूमती है और उसका ट्रीटमेंट भी विषय के मुताबिक सेंसुअस ही रखा गया है।

मगर बीते कुछ सालों में आई ज्यादातर फिल्मों ने सेंसुअस दृश्यों को सीधे-सीधे हॉलीवुड की फिल्मों से कॉपी करना शुरु कर दिया। मुझे नहीं लगता कि ये फिल्में सचमुच भारतीय दर्शकों को ऐंद्रिक लगती होंगी। वहीं दक्षिण की फिल्मों मे सेक्स के चित्रण को एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग फूहड़ कहकर खारिज कर देता है। दरअसल इसके पीछे हमारी वह मानसिकता काम करती है जो किसी भी भारतीय छवि को नापसंद करती है। मुझे लगता है कि भरत मुनि के श्रृंगार रस की अवधारणा दक्षिण के निर्देशकों ने खूब आत्मसात की है। वे राम गोपाल वर्मा और अनुराग बसु के मुकाबले उन ऐंद्रिक छवियों को उभारते हैं जो हमारे आसपास के जीवन में शामिल होती है और कहीं न कहीं हमारे अचेतन में बसी होती है।

आम तौर पर हम अपने अचेतन में दबी सेक्स छवियों को ही फैंटेसी में एक्सप्लोर करना चाहते हैं। दक्षिण के निर्देशक इसे खूब जानते हैं और वे इस तरह के दृश्यों में अद्भुत कल्पनाशीलता दिखाते हैं। चाहे वे मणि रत्नम जैसे परिष्कृत निर्देशक हों या मसाला तेलुगु फिल्मों के निर्देशक। उनकी नायिकाएं भारतीय छवि के साथ स्क्रीन पर आती हैं। उनकी सेक्सुअलिटी भी भारतीय होती है। उन प्रेम दृश्यों का वातावरण अनोखा हो सकता है और आपकी कल्पना को उत्तेजित भी कर सकता है पर अक्सर वह बनावटी या किसी विदेशी परिवेश की नकल नहीं होता।


हां, बस इतना कहा जा सकता है कि दक्षिण की और कमोवेश यह पूरे भारतीय सिनेमा पर लागू होता है- कि सारी ऐंद्रिकता पर एक पुरुष का नजरिया हावी होता है। यह दक्षिण में कुछ ज्यादा दिखता है। वे सेक्स का चित्रण भी पुरुष की डामिनेटिंग छवि को ही सामने रखकर करते हैं। स्त्रियां यहां पर पुरुष को खुश रखने वाली एक खूबसूरत अप्सरा अथवा गुड़िया के रूप में सामने आती हैं।

आम तौर पर सिनेमा में सेक्सुअलिटी के प्रति भारतीय जनमानस और खुद फिल्मकारों में काफी पुर्वग्रह हैं। इसे लेकर काफी बहस भी होती है। सिनेमा में सेक्स के ज्यादा स्पष्ट चित्रण को भारतीय संस्कृति के खिलाफ माना जाता है। तो फिर दक्षिण का सिनेमा तो शायद हमारी भारतीय और सांस्कृतिक इरोटिक परंपराओं को खंगाल रहा है? इसे लेकर बहस का रुख क्या होगा?

Saturday 22 August 2009

जेम्स कैमरॉन का नया 'अवतार'


पेंडोरा नाम के सुदूर ग्रह पर एक अनजान सभ्यता और मानव जाति के बीच जंग और उसके बीच पनप रही कोमल संवेदनाओं को बचाने की जद्दोजहद। कथानक उत्सुकता जगाता है न! और बहुत सारी संभावनाएं भी। जेम्स कैमरॉन से मुझे हमेशा बहुत उम्मीदें रहती हैं। वे सही मायनों एक ऐसे फिल्मकार हैं जो पर्दे पर आपकी कल्पना से परे का एक संसार रचते हैं। टाइटेनिक और टर्मिनेटर की दूसरी कड़ी मेरी ऑल टाइम फेवरेट फिल्मों में से हैं। इस बार वे डिजिटल थ्री-डी साइंस इपिक रचने जा रहे हैं। फिल्म का नाम है अवतार। यह फिल्म कई वजहों से उत्सुकता जगाती है। पहली तो अपने शीर्षक को लेकर, जो विज्ञान और भारतीय दर्शन और मिथ के बीच कड़ी जोड़ता दिखता है।

देखें तो यह 1997 में आई टाइटैनिक के बाद कैमरॉन की पहली महत्वाकांक्षी फिल्म है। यह पूरी फिल्म खुद कैमरॉन के विकसित किए फ्यूजन डिजिटल थ्री-डी कैमरा से शूट की गई है। विन्स पेस के सहयोग से तैयार किए गए इस कैमरे की मदद से संभवतः पहली बार कंप्यूटर से तैयार छवियों और लाइव एक्शन परपारमेंस का एक ऐसा मिश्रित प्रभाव पैदा किया जा सकेगा जो अब तक किसी फिल्म में संभव नहीं हो सका है। बता दें कि विन्स पेस एक अवार्ड विनर फोटोग्राफर हैं और टाइटेनिक की अंडरवाटर लाइटिंग में उन्हीं का कमाल था। इस फिल्म के लिए डेवलप किए गए क्रांतिकारी मोशन कैप्चर सिस्टम की मदद से न सिर्फ अभिनेताओं के चेहरे के भावों को नियंत्रित किया जा सकेगा बल्कि वे यह भी जान सकेंगे कि उनके कंप्यूटर संचालित चरित्र किस तरह दिखेंगे। इस फिल्म में जटिल विजुअल इफेक्ट्स के लिए पीटर जैक्सन के आस्कर से सम्मानित वीटा डिजिटल विजुअल इफेक्ट को हायर किया गया है।


यह कहानी है जैक सुली की, जो पहले एक जहाजी था और धरती पर चल रहे युद्ध के दौरान घायल होकर कमर के नीचे अपाहिज हो गया है। जैक को अवतार प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए चुना जाता है, जिसकी मदद से वह चलने में सक्षम हो जाएगा। जैक पेंडोरा की यात्रा पर जाता है, जो अंतरिक्ष में घने जंगलों से आच्छादित एक उपग्रह है, जहां जीवन के अद्भुत रूप हैं, कुछ खूबसूरत और कुछ बहुत ही भयावह। पेंडोरा ही नैवियों का घर है। जो कि मनुष्यों की एक संवेदनशील प्रजाति हैं, जिन्हें मानव आदिम समझते हैं मगर वास्तव में उनकी उत्पति इंसानों से उन्नत रूप में हुई है। करीब तीन मीटर ऊंचे कद, नीले रंग की चमड़ी और पूंछ वाले नैवी अपनी दुनिया में काफी खुशी और मेलजोल के साथ रहते हैं। संघर्ष वहां से जन्म लेता है जब मनुष्य पैंडोरा के घने जंगलों में दुर्लभ खनिज की तलाश में अतिक्रमण करने लगते हैं और नैवी योद्धा अपने अस्तित्व के खिलाफ इस हमले पर एकजुट होने लगते हैं।

जैक अनजाने में ही इस अतिक्रमण का हिस्सा बन जाता है। क्योंकि मानव जाति पैंडोरा के वातावरण में सांस लेने में असमर्थ हैं इसलिए अवतार के नाम से मनुष्यों में जेनेटिक परिवर्तन किए जाते हैं। ये अवतार जीवित रह सकते हैं, सांस ले सकते हैं मगर उनका शरीर मनुष्य चालित ड्राइवर द्वारा नियंत्रित होता है, जो अवतार के शरीर पर नियंत्रण रखने वाले मस्तिष्क की तरह है।

इस अवतार के जरिए जैक को एक बार पुनः अपना पूरा शरीर हासिल हो जाता है और वह योद्धाओं के एक दल के साथ पैंडोरा के घने जंगलों में भेजा जाता है, जहां उसका सामना खूबसूरती और आतंक दोनों से होता है। वहां उसकी नयत्री नाम की एक खूबसूरत नैवी स्त्री से मुलाकात होती है। यहां नियति एक अजीब खेल रचती है और जैक नयत्री के मोहपाश में बंध जाता है और उसके सामने खड़ा हो जाता है पूरी दुनिया के भाग्य का फैसला करने वाले युद्ध में अपना पक्ष चुनने का संशय।


सन 1994 में फिल्म के निर्देशक जेम्स कैमरॉन ने 80 पेज की इस पटकथा को तैयार कर लिया था। यह पटकथा दरअसल उनकी बचपन में पढ़ी किसी विज्ञान कथा से प्रेरित थी। कैमरॉन ने देखा कि कैसे इस कहानी में दिखाया गया है कि उन्नत सभ्यताएं मूल संस्कृति को नष्ट करती चली जाती हैं। 1996 अगस्त में कैमरॉन ने घोषणा की थी कि टाइटैनिक के बाद उनकी अगली फिल्म अवतार होगी। इस वे कंप्यूटर से निर्मित सिंथेटिक अभिनेताओं की मदद से बनाएंगे। इस पूरी परियोजना पर 100 करोड़ डॉलर खर्च का अनुमान लगाया गया था। इसके लिए उन छह अभिनेताओं को तैयार करना था जो जो वास्तविक हैं मगर भौतिक दुनिया मे मौजूद नहीं हैं। इसके लिए कैमरॉन की पार्टनिशिप वाले डिजिटल डोमेन हाउस की भागीदारी भी तय हो गई थी। मगर यह पूरा प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

कैमरॉन ने यह भी कहा था कि अगर अवतार सफल रहा था तो उन्हें उम्मीद है कि इस फिल्म के दो सिक्वेल और बनेंगे। जनवरी से अप्रैल 2006 तक कैमरॉन ने स्क्रिप्ट पर काम किया। खास बात यह है कि इस फिल्म में नैवी नामक जाति की भाषा और उनकी पूरी संस्कृति को पटकथा के भीतर विकसित करने के लिए कैमरॉन ने पॉल फार्मर नाम के एक भाषाविद् और यूएससी प्रबंधन संचार केंद्र के निदेशक के साथ कार्य काम किया। सितंबर 2006 में कैमरॉन ने फिल्म के लिए अपने रियलिटी कैमरा सिस्टम 3D की घोषणा की थी। इस प्रणाली के तहत एक कैमरे में दो हाई-डिफिनिशन कैमरों का इस्तेमाल करके तस्वीरों में गहराई का आयाम हासिल किया जा सकेगा।


कैमरॉन बताया कि फिल्म निर्माण में देरी की एक वजह यह भी थी कि 1990 के दशक में उन्हें अपनी परियोजना के लिए ज्यादा उन्नत तकनीक का इंतजार था। मोशन कैप्चर एनीमेशन टेक्नोलॉजी की मदद से फोटो रियलिस्टिक कंप्यूटर जेनरेटेड चरित्रों को तैयार करने में उन्हें करीब 14 महीनों का वक्त लग गया। अभी तक यह होता था कि अभिनेताओं की वास्तविक गतिविधियों में डिजिटल एनवायरमेंट जोड़ा जाता था। कैमरॉन के वर्चुअल कैमरे की मदद से अब यह संभव था कि डिजिटल चरित्र तथा वातावरण के बीच अभिनेताओं की गतिविधियों को देखा जा सके। लिहाजा निर्देशक पूरे काल्पनिक दृश्य को संभव होते हुए देख सकेगा और उसके मुताबिक दृश्यों को निर्देशित किया जा सकेगा। इस नई तकनीकी का परिक्षण निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने भी किया और इस दौरान स्टार वार्स के निर्देशक जॉर्ज लुकास भी मौजूद रहे।

इस तकनीकी में एक उपकरण का इस्तेमाल किया जाएगा। जिसके तहत अभिनेता के सिर पर लगी एक टोपी में नन्हा कैमरा फिट होगा। यह कैमरा अभिनेता के चेहरे के भावों तथा आंखों की सूक्ष्मतम गतिविधियों को दर्ज करेगा और उसे कंप्यूटर को ट्रांस्फर करता रहेगा। इस तरह से अभिनेताओं की आंगिक गतिविधियों का 95 प्रतिशत डिजिटल फार्मेट में बदलते हुए कंप्यूटर में दर्ज होता चला जाएगा। इस तरीके से लाइव एक्शन के वक्त ही एनीमेडेटेड दुनिया और चरित्रों के साथ संवाद और अभिनय का तारतम्य स्थापित किया जा सकेगा।


कैमरॉन इस फिल्म को एक हाइब्रिड फिल्म कहना पसंद करते हैं जो कंप्यूटर जनित चरित्रों, वास्तविक वातावरण और लाइव एक्शन शूट का मिला-जुला रूप होगा। इंटरनेट पर उपलब्ध फिल्म के ट्रेलर आपको कल्पनाओं से परे की एक अद्भुत दुनिया में ले जाते हैं। उम्मीद है कि शायद एक बार फिर स्टार वार्स, टर्मिनेटर और मैट्रिक्स की तरह एक नई फंतासी आने वाले वर्षों में सिनेमा दर्शकों के दिलो-दिमाग पर राज करेगी।

Saturday 15 August 2009

रजत कपूर से एक मुलाकात


रजत कपूर ने बतौर अभिनेता सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा था फिल्म 'दिल चाहता है' में। उनकी शख्सियत में कुछ-कुछ गिरीश कर्नाड जैसी गंभीरता भरी सादगी थी। एक खास तरह की डिग्निटी, सहजता और अभिजात्य का मिला-जुला रूप। उस वक्त तक मैं रजत कपूर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था।

एक दिन अनजाने में मेरे हाथ उनकी फिल्म 'ऱघु रोमियो' लग गई। यह फिल्म छोटे शहरों में रिलीज नहीं हो पाई थी और इसके प्रदर्शन के करीब साल भर बाद मैंने इसे देखा होगा। इस फिल्म को देखकर मैं हतप्रभ रह गया था। कई सालों बाद मैंने कोई ऐसी फिल्म देखी थी जिसे देखकर किसी पुरानी फिल्म की याद नहीं आई। न कथ्य में, न शैली में और न ही किसी अन्य बात में। यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर आप कहें, 'हां, यह है कुछ अलग...'

करीब साल भर पहले मैंने उनकी तीसरी फिल्म 'मिथ्या' देखी। जिसकी बहुस्तरीय जटिलता चकित कर देने वाली है। दिलचस्प बात यह है कि 'मिथ्या' जैसी फिल्मों की तारीफ तो हुई मगर कोई भी समीक्षक फिल्म की बहुस्तरीयता और आइडेंटिटी क्राइसिस जैसे पहलुओं पर रोशनी नहीं डाल सका। इस बीच रजत कपूर के बारे में पढ़ता और समझता रहा।

यह साफ हो गया कि रजत कपूर की कोशिशों से देखते-देखते हिन्दी में एक खास किस्म का सिनेमा सामने आया, जिसे हम न्यू सिनेमा या इंडिपेंडेंट सिनेमा कह सकते हैं। इसके साथ ही मन में कुछ सवाल भी उठते रहे। पिछले हफ्ते मुझे पता लगा कि रजत कपूर बैंगलोर में अपना नाटक हैमलेटः द क्लाउन प्रिंस लेकर आ रहे हैं तो तय किया कि नाटक देखने के बहाने रजत कपूर से मुलाकात करनी है। यह जानकर खुशी भी हुई और अफसोस भी कि हैमलेट के दो दिनों के सभी शो एडवांस में फुल हो चुके थे। लिहाजा मैंने रजत कपूर से मिलने का वक्त मांगा और तय हुआ कि रंग शंकरा में शाम साढ़े पांच बजे वे मुझसे मिलेंगे।


रंग शंकरा दरअसल मालगुड़ी डेज वाले शंकर नाग की स्मृति में बनाया गया एक बेहद खूबसूरत सा और बेहद सक्रिय थिएटर है। भीतर जाते ही एक बड़ा हॉल और बगल में सुंदर सा कैफेटेरिया... मैं नियत समय पर वहां पहुंच गया। थोड़ी देर में रजत सीढ़ियों से उतरते दिखाई दिए। उन्होंने मुझे पूछा बातचीत रिकार्ड कैसे होगी। संयोग इस आपाधापी के बीच मैं अपने साथ रिकार्डर नहीं ला सका। मेरी नोटबुक देखकर वे थोड़े निराश हुए मगर मैंने उन्हें बातचीत के लिए मना ही लिया। अपने लिए ब्लैक कॉफी और मेरे लिये चाय का आर्डर देकर वे बैठे और बातचीत शुरु हो गई।

बातचीत के दौरान ऊपर से सहज दिखते हुए भी रजत भीतर से कहीं सतर्क थे। उनकी यह सतर्कता साफ बताती थी कि वे अपनी रचनात्मकता को लेकर खासे गंभीर हैं। बातचीत मेरे लिए बहुत संतोषजनक नहीं थई। एक अर्थों में यह बातचीत उन्हें एक्सप्लोर नहीं करती थी, बल्कि पहले से तय कुछ बिंदुओं पर मुहर लगाती चली। उनके ज्यादातर जवाब मेरे लिए प्रत्याशित थे। दूसरे शब्दों में मैं रजत कपूर के बारे में जैसा मैंने सोचा था वे लगभग उसी पर मुहर लगाते चले। बहरहाल आधे घंटे के भीतर इससे अधिक उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।

इस बातचीत में कुछ दिलचस्प बिंदु कौंधते चले। जैसे कि उनके प्रिय लेखक हैं मिलान कुंदेरा। जिन्होंने मिलान कुंदेरा को पढ़ा हो उनके पास रजत की फिल्मों को ज्यादा बेहतर ढंग से एक्सप्लोर करने वाली कुंजी हाथ लग सकती है। कुंदेरा अपनी रचनाओं में ब्लैक ह्यूमर और एक सत्तात्मक समाज में मनुष्य की आइडेंटिटी के सवाल को उठाए जाने के कारण जाने जाते हैं। मिलान ने अपने उपन्यासों मे सेक्स को बतौर पोलिटिकल मेटाफर इस्तेमाल किया है। मिलान कुंदेरा यदि रजत कपूर के प्रिय लेखक हैं तो यह उनसे उम्मीदें बढ़ा देता है।

उसने हुई बातचीत यहां लगभग शब्दशः प्रस्तुत हैः


आप आप मानते हैं कि आप का सिनेमा अब तक का जो सिनेमा था उससे अलग है? यदि अलग है तो आप उसे कैसे डिफाइन करेंगे?

क्या आपको नहीं लगता कि यह सिनेमा अब के सिनेमा से अलग है? फर्क हमारी सेंसिबिलिटी का है। कहानी बताने का तरीका, जीवन को देखने का तरीका अलग है।

लेकिन क्या आप सत्तर के दशक में उभरे कला सिनेमा आंदोलन से खुद को जोड़ते हैं?

नहीं। दरअसल आर्ट सिनेमा का ट्रीटमेंट रियलिस्टिक था। मेरा सिनेमा रियलिज्म से बहुत दूर है। यह उन अर्थों में यथार्थवादी सिनेमा नहीं है, जिस तरह का सिनेमा सत्तर के दशक में आया था। अब बात आती है चॉयस आफ सब्जेक्ट की तो यकीनन हमारा चॉयस डिफरेंट है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे बहुत फार्मल थे और मैं नॉन रियलिस्टिक हूं।

तो क्या हम मानें कि आपकी सेंसिबिलटी पर मारक्वेज जैसे पोस्ट मार्डन लेखकों का असर है, जिन्होंने यथार्थवादी सांचे को तोड़कर अपनी बात कही...

मारक्वेज को मैं पसंद करता हूं मगर जिस लेखक का काम मुझे सबसे ज्यादा पसंद है वह हैं चेक लेखक मिलान कुंडेरा। इसके अलावा सेंसिबिलिटी के लेवेल पर देखे तो चार्ली चैपलिन को मैं बहुत पसंद करता हूं।

आप खुद को किस परंपरा से जोड़ना पसंद करेंगे, भारतीय सिनेमा या यूरोपियन?

मेरे लिए इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल होगा। मैं खुद नहीं जानता कि मैं किस परंपरा से अपने को जोड़ूं....


तो 'रजत कपूर काइंड आफ सिनेमा' को हम कैसे परिभाषित करें?

मेरा मकसद एक ऐसी फिल्म बनाना है, जिसमें मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकूं। जिसे दिखाकर लोगों को मैं कह सकूं कि 'यह मैं हूं'... वह मेरी आस्था हो, मेरी एक्सपीरिएंसेज हों। मैं खुद को एक ग्लोबल सिटिजन मानता हूं। मेरी अपब्रिंगिंग अलग हुई है। तो मेरी एक खास किस्म की संवेदनाएं हैं, मैं उन्हें आसानी से किसी दायरे में नहीं बांध सकता।

अपनी तरह का सिनेमा बनाने में आपको कितना वक्त लग गया?

पूरे 18 साल। मैं 1988 में पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से पास आउट हुआ था। 1997 में बनी मेरी पहली फिल्म 'प्राइवेट डिटेक्टिव' रिलीज ही नहीं हो सकी।

तो आपको सही मौका कैसे मिला?

पिछले कुछ सालों में बड़ा बदलाव आया। इसमें सबसे अहम है मल्टीप्लेक्स की चेन। आज अगर मल्टीप्लेक्स न होते तो हम 'रघु रोमियो' और 'मिथ्या' जैसी फिल्में रिलीज करने के बारे में सोच ही नहीं सकते थे।

नई पीढ़ी के निर्देशकों मे से कुछ अपनी पसंद के लोगों का नाम लेना चाहेंगे?

अनुराग की 'देव-डी' मेरी फेवरेट फिल्म है। हालांकि उन्होंने 'नो स्मोकिंग' जैसी खराब फिल्म भी बनाई है। श्रीराम राघवन मेरे दोस्त हैं मगर वे बहुत अच्छे फिल्ममेकर भी हैं। उन्हें भी लंबे समय बाद 'एक हसीना थी' जैसी फिल्म बनाने का मौका मिला। मेरे लिये भी 'रघु रोमियो' और उसका लोकार्नो फिल्म महोत्सव में जाना एक टर्निंग प्वाइंट था।

भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

नई फिल्म 'ए रेक्टेंग्यूलर लव स्टोरी' आने वाली है। इसके अलावा तीन फिल्मों की पटकथा पर काम लगभग तैयार है।

क्या अभी भी डिफरेंट फिल्म बनाना घाटे का सौदा है?

अभी लगाया हुआ पैसा वापस पाना आसान है। हम सस्ते में फिल्म बना लेते हैं। इंडिपेंडेंट सिनेमा का मतलब ही यही होना चाहिए। हर चीज से आजादी....
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यह बातचीत मूल रूप से दैट्स हिन्दी वेबसाइट में प्रकाशित हुई है।
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Wednesday 1 July 2009

बंबई रात की बाहों में


राजकपूर के लिए सदाबहार हिट फिल्में देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद के निर्देशन में भी बहुत सी फिल्में बनाई हैं और आम तौर पर उनकी फिल्में तत्कालीन आलोचकों द्वारा खारिज कर दी जाती थीं। यह माना जाता था कि जब अब्बास खुद के निर्देशक में फिल्म बनाते थे तो वे संतुलित नहीं रह पाते थे और उनकी फिल्म भाषणबाजी में खो जाती थी। इसके बावजूद मेरा मानना है कि भारत में इंडिपेंडेंट सिनेमा जैसी अवधारणा पर उस वक्त अब्बास ही काम कर रहे थे। यह अलग बात थी कि उस वक्त का सेटअप ऐसा नहीं था। ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन वाली एक ही फिल्म मैंने देखी है और वह है परदेसी। यह शायद भारत की पहली फिल्म थी जो रूस के सहयोग से बनी थी। इस फिल्म में उनका और रूस के निर्देशक वसीली प्रोनिन का संयुक्त निर्देशन था। तकनीकी रूप से यह उस दौर की उत्कृष्ट फिल्मों मे एक थी।

ख्वाजा अहमद अब्बास की दो फिल्में मैंने पढ़ी हैं। फिल्म पत्रिका माधुरी ने शहर और सपना का पुनरावलोकन प्रकाशित किया था। यह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था। ऐसा मुझे आज तक दोबारा देखने को नहीं मिला। दूसरी फिल्म थी बंबई रात की बाहों में, जिसका मैं यहां जिक्र करना चाहूंगा। 1968 में रिलीज इस फिल्म में उस दौर के ज्यादातर नए चेहरे ही रहे होंगे, जलाल आगा, परिसिस खंबाटा आदि। यह उपन्यास के रूप में इसी नाम से हिन्द पाकेट बुक्स से छपा था। वह भी काफी पुराना संस्करण था और मेरी मां की किताबों के कलेक्शन में मौजूद था इसलिए मुझे पढ़ने को मिल गया। जाहिर तौर पर यह फिल्म की पटकथा को आधार बनाकर लिखा गया होगा मगर इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बेहतर उपन्यास भी है।

बंबई रात की बाहों में शायद अपने समय से आगे की फिल्म रही होगी। यह इस कदर प्रासंगिक है कि आज भी अनुराग कश्यप, निशिकांत कामत (डोबिवली फास्ट, मुंबई मेरी जान) या राजकुमार गुप्ता (आमिर) जैसा निर्देशक इस उपन्यास को आधार बनाकर एक शानदार फिल्म बना सकता है। यह दरअसल मुंबई के एक दिन या कहें तो मुंबई की एक रात की कहानी है। सिर्फ एक रात कई लोगों की जिंदगी बदल देती है। यह उपन्यास पढ़े अरसा गुजर गया इसलिए मुझे अफसोस है कि मैं इस पर बहुत अधिकार के साथ नहीं लिख पाऊंगा मगर यह एक ईमानदार पत्रकार की कहानी है। अपनी पत्नी से उसके संबंध टूटने के कगार पर हैं। फिल्म में एक खल चरित्र भी है और वह एक यादगार चरित्र है।

पूरा उपन्यास एक थ्रिलर की शक्ल में लिखा गया है मगर थ्रिलर के फारमैट में वह एक महानगर के अंधेरे हिस्से को उजागर करता चलता है। कहानी कहीं भी अपने चरित्रों से नहीं भटकती मगर दिलचस्प बात यह है कि उससे सामाजिक सारोकार बहुत गहरे हैं। इसे सीन और शॉट कंपोजिशन की तकनीकी को आधार बनाते हुए लिखा गया है। इसलिए इस उपन्यास में दृश्यात्मकता और बांधने वाले तत्व बहुत मजबूत हैं। इस कुछ दृश्य मुझे आज भी नहीं भूलते। मुंबई की बारिश का चित्रण। देर रात चलने वाली पार्टियां और उनकी जलती-बुझती रोशनी में चेहरे, सूनी सड़कों पर तेज भागती गाड़ियां और लैंप पोस्ट पर चिपके हॉलीवुड के पोस्टर।

बंबई रात की बाहों में का हर चरित्र गहराई से एक दूसरे से जुडा़ हुआ है। यह एक तेज रफ्तार से भागती कहानी है। एक रात मे ही उनके बीच की कड़वाहट, उनके सामाजिक अंतर्विरोध और उनकी छटपटाहट सामने आ जाती है। यह दूसरी ऐसी किताब है जिसे मैंने फिल्म की तरह देखा। यह उपन्यास बताता है का पॉपुलर फारमैट इस्तेमाल गंभीर बातों को कहने के लिए किस तरह किया जा सकता है। जैसा कि आज बहुत से निर्देशक और लेखक कर रहे हैं।

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ऊपर दी गई तस्वीर मे ख्वाजा अहमद अब्बास राजकपूर के साथ एकदम बाईं तरफ दिख रहे हैं। तस्वीर www.rajkapoorworld.com से साभार

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Thursday 25 June 2009

अनजान टापू पर नफरत और प्रेम


किताबों और फिल्मों का गहरा रिश्ता है। गौर करें तो भारतीय समांतर सिनेमा या जिसे हम कला सिनेमा कहते हैं उसकी बुनियाद में ही आधुनिक हिन्दी साहित्य है। इस पर मैं कभी अलग से लिखना चाहूंगा। इसे छोड़ भी दें तो दुनिया भर में स्तरीय सिनेमा का निर्माण किताबों को आधार बनाकर हुआ है। गॉन विथ द विंड, बेनहर, ए फेयर टू आर्म्स, डाक्टर जिवागो, ग्रैफ्स आफ रैथ, पाथेर पांचाली, गाइड जैसी तमाम फिल्में हैं, जिनका नाम लिया जा सकता है। यहां तक कि मदर इंडिया भी पर्ल एस बक के उपन्यास को आधार बनाकर लिखी गई थी।

मगर मैं यहां कुछ उन उपन्यासों का जिक्र करना चाहता हूं जो अपने विन्यास में सिनेमा के बहुत करीब हैं। बड़े फलक पर देखें तो इसमें कृश्न चंदर के कई उपन्यास, विभूतिभूषण बंधोपाध्याय की पाथेर पांचाली और आरके नारायण की गाइड को भी समेटा जा सकता है। इन उपन्यासों को पढ़ना दरअसल एक किस्म के गहन सिनेमाई अनुभव से गुजरना है। मगर इनके बारे में भी फिर कभी बात होगी।

इस पोस्ट में मैं सिर्फ उन दो उपन्यासों का जिक्र करना चाहूंगा जो अपने-आप में पूरे उपन्यास हैं मगर उनकी संरचना सिनेमा को आधार बनाकर की गई है। इन्हें पढ़ना सचमुच उपन्यास पढ़ने से ज्यादा एक 'फिल्म देखना' है। जब मैं 'फिल्म देखना' शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं तो इस काफी गंभीर और कलात्मक मायनों में समझने की कोशिश कर रहा हं। किसी भी उपन्यास की भाषा को एक स्तरीय सिनेमा देखने के अनुभव के करीब ला सकने के लिए बड़े भाषाई कौशल की जरूरत होती है। इसके लिए जरूरी है कि कथानक में सिनेमा की पटकथा जैसी चुस्ती तो हो मगर वह किसी घटिया जासूसी उपन्यास में न बदलने पाए। भाषा में ऐसी बिंबात्मकता हो कि आप एक बेहतरीन सिनेमा देखने के अनुभव से गुजर सकें। इस सबके बाद भी वह एक स्तरीय साहित्यिक रचना की कसौटियों पर भी खरा उतरे।

मैंने दरअसल बचपन से किशोरावस्था के बीच दो ऐसे ही 'उपन्यास देखे' या 'फिल्में पढ़ीं'। इन दोनों उपन्यासों से मैंने कहानी कहने के तरीके और नैरेशन के बारे में काफी कुछ सीखा। इतना ही नहीं सिनेमा के नैरेशन को शायद मैं आज इतना बेहतर नहीं समझ सकता था अगर मैंने ये दो किताबें न पढ़ी होतीं। पहली किताब थी मनोहर मलगांवकर की 'शालीमार' और दूसरी थी ख्वाजा अहमद अब्बास की 'बंबई रात की बाहों में'।

पहली किताब के बारे में पहले।

पटकथा लेखन के उस्ताद कृष्णा शाह ने 'शालीमार' की पटकथा खुद स्टैनफर्ड शेरमॅन के साथ मिलकर लिखी थी। चूंकि शालीमार अपने दौर की एक महत्वाकांक्षी फिल्म थी और कृष्णा शाह खुद हॉलीवुड और ब्रॉड-वे में काफी हाथ आजमा चुके थे, लिहाजा उन्होंने इस पर किताब लिखने का जिम्मा सौंपा अंग्रेजी के लेखक मनोहर मलगांवकर को, जो अपनी किताब 'द मैन हू किल्ड गांधी' की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं। मैंने इसका हिन्दी अनुवाद पढ़ा, जो वाकई बहुत अच्छा था। इसे हिन्दी-उर्दू मिश्रित खालिस हिन्दुस्तानी जुबान में लिखा गया था। तो इस तरह से चार दिग्गजों की मेहनत से जो किताब तैयार हुई थी वह वाकई लाजवाब थी।

किताब की सबसे बड़ी खूबी थी चरित्र चित्रण, खूब-खूब बारीक डिटेल्स और दिलचस्प ब्योरे। शालीमार, जो एक फ्लाप और अपने समय से आगे की फिल्म मानी जाती है, हूबहू इस उपन्यास को आधार बनाकर लिखी गई थी। यदि आप उपन्यास पढ़कर फिल्म देखें तो हैरान रह जाएंगे कि हीरे की चोरी जैसे घिसे हुए सब्जेक्ट पर क्या वाकई इतने शोध के साथ लिखा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि उपन्यास के विपरीत फिल्म मुंबइया लटकों-झटकों और गानों में फंसकर रह गई।

वापस लौटते हैं किताब पर। किताब दो भागों में है। पहला भाग बहुत छोटा है छह सात पृष्ठों का। इसे नायिका की आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। पूणे में एक आर्मी के जवान से प्यार होना और धोखा खाना। बस इतना ही। अगला भाग दरअसल एक थ्रिलर जैसा है। हीरों की चोरी के लिए जुटे दुनिया के दिग्गज चोर, कानून की पहुंच से दूर एक टापू और साजिश। इस उपन्यास की खूबी है इसके बारीक तथ्यों से सजाए गए ब्योरे।


शुरुआत एक हत्या से होती है। जिस गन से गोली चलती है आप उसकी तकनीकी खूबियों से भी वाकिफ हो जाते हैं। आगे आने वाले हर किरदार का अपना इतिहास है। वह काल्पनिक नहीं है। एंटर द ड्रैगन के अभिनेता जॉन सैक्सन के निभाए किरदार के बारे में आप जानना शुरु करते हैं तो उनका फौजी इतिहास, वास्तविक युद्ध के डिटेल सामने आते हैं। वे बोल नहीं सकते- इसकी बाइलोजिकल डिटेल भी आपको पता चलती है। उनकी छड़ी आवाज नहीं करती क्योंकि उसके नीचे एक रबर का टुकड़ा लगा है।

फिल्म के विलेन रेक्स हैरीसन एक नफासत पसंद खलनायक है। किताब में उसके खाने की मेज पर लगे लजीज पकवानों का भी जिक्र है। खुले में पकाई जा रही समुद्री मछलियों से लेकर महल में सजी नाजुक और खूबसूरत सजावटी चीजों तक में आप रमने लगते हैं। इसमें खूबसूरत सोने की परत वाले सिगरेट केस, चाइनीज क्राकरी, पर्दे से लेकर बाथरूम मे लगे कीमती टाइल्स तक के बारे में इतनी बारीकी से लिखा गया है कि पढ़ते-पढ़ते आपको लगता है आप सचमुच किसी टापू में बने आलीशान महल के मेहमान हैं। और जब आप हिफाजत में रखे गए हीरे की तरफ बढ़ते हैं तो उन तकनीकी बारीकियों से दो-चार होते हैं जो उस हीरे की हिफाजत के लिए जुटाई गई हैं। जमीन में बिछाए विस्फोटक, लेजर बीम, अलार्म, क्लोज सर्किट कैमरों के बारे में बहुत प्रमाणिकता से लिखा गया है।

इस सबके बाद भी अगर सिर्फ इतना होता तो यह एक दिलचस्प उपन्यास नहीं होता। यहां चरित्रों के बीच दिलचस्प टकराव है, उनका सेंस आफ ह्यूमर, उनके बदलते रंग हैं जो आपको हैरत में डाल देते हैं। सिनेमा मे मोंताज विधा का व्याकरण रचने वाले आइजेंस्टाइन ने लिखा था कि कैसे सपाट चरित्र होने पर आप अपनी दिलचस्पी खो देते हैं और चरित्र की अनिश्चितता आपको उसमें उलझाए रखती है।

'शालीमार' का हर चरित्र बहुआयामी है। जीनत एक सांवली नर्स है। नायक की पूर्व प्रेमिका। उससे नफरत करती है मगर कई प्रसंगों में पुराना आकर्षण जोर मारने लगता है। प्रेम आवेग के साथ उमड़ता है तो फरेब की कड़वाहट भी आ जाती है। उपन्यास के कई हिस्से नायक-नायिका के बीच दिलचस्प नोकझोंक से भरे हैं। रेक्स हैरिसन एक तहजीब और नफासत पसंद खलनायक है। उसकी इस नफासत में छिपी क्रूरता का एहसास हमें एक ही दृश्य में हो जाता है, जहां एक व्यक्ति को गोली से मौत के बाद वह नौकरों से कहता है कि यहां की गंदगी साफ करो।

कुल मिलाकर सभ्यता से दूर एक अपराधी की मिल्कियत वाला अनजान टापू, दुनिया भर को चोरों का जमावड़ा, करोड़ों की कीमत का सुर्ख खूबसूरत हीरा, इस पृष्ठभूमि में पनपती नफरत और मुहब्बत... 'शालीमार' आपको किसी और ही दुनिया मे ले जाता है। उपन्यास का अंत थोड़ा कमजोर है और उतना भव्य नहीं है, जैसा कि पूरे उपन्यास का कैनवस है, मगर आप अलग तरह के अनुभव से गजरने की संतुष्टि के साथ उपन्यास रखते हैं।

'बंबई रात की बाहों में' के बारे में अगली बार।

Saturday 13 June 2009

वो जमाना 'थ्रिलर्स' का!


हिन्दी सिनेमा ने थ्रिलर की अपनी एक दिलचस्प स्टाइल डेवलप की थी, जो अचानक खत्म हो गई। अगर गौर करें तो सत्तर-अस्सी का दशक का हिन्दी सिनेमा इन थ्रिलर फिल्मों के लिहाज से बहुत समृद्ध था। इसमें विजय आनंद, बीआर चोपड़ा और राज खोसला जैसे निर्देशकों का काफी योगदान था। इन फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी थी- सोशल सिनेमा के ढांचे में एक कसी- घुमावदार पटकथा और शानदार अभिनय। ज्यादातर फिल्में उस फिल्म से जुड़े कलाकारों के बेहतर अभिनय के कारण याद रह जाती हैं। चुस्त संवाद, खूबसूरत लोकेशन, दिल को छूने वाला संगीत और गीत के टटके बोल। यह सब कुछ इतनी खूबसूरती से एक-दूसरे में पिरोया गया होता था कि इसके मुकाबले हाल की तकनीकी चकाचौंधी वाली थ्रिलर फिल्में बनावटी लगती हैं। आपको कुछ भी ऐसा नहीं मिलता है जिसे आप हाल से बाहर निकलने के बाद याद रख सकें।

उस दौर के थ्रिलर में सबसे शानदार और क्लासिक उदाहरण तो ज्वेल थीफ का है। सिर्फ तीन फिल्में गाइड, ज्वेल थीफ और तेरे मेरे सपने विजय आनंद को हिन्दी सिनेमा के महान निर्देशकों की कतार में रखने को काफी हैं। अफसोस की बात है कि इस नजरिए से कभी उनका मूल्यांकन ही नहीं हुआ। ज्वेल थीफ फिल्म की शुरुआत ही अप्रत्याशित घटनाओं से होती है। यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे एक निर्देशक दर्शकों के मनोविज्ञान से खेल सकता है। इसका उदाहरण सिर्फ वह लंबा पार्टी सीन है जब विनय यानी देव आनंद को शालिनी यानी कि वैजयंती माला उसका हमशक्ल अमर समझ लेती है। इस लंबे सीन में निर्देशक ने सस्पेंस बनाए रखा है। और देव के मोजे उतारने तक हम दुविधा में रहते हैं। यह पहला दृश्य ही इस बात को इतनी गहराई से हमारे दिमाग में स्टैब्लिश कर देता है कि नायक का कोई हमशक्ल है और उसका नाम अमर है।

फिल्म इतने ट्विस्ट हैं कि आप इंतजार करते रहते हैं कि अब क्या होगा... इसके अलावा यह फिल्म अशोक कुमार, देव आनंद और वैजयंती माला के बेहतरीन अभिनय के कारण भी हमेशा याद रहेगी। इस फिल्म की खूबी है थ्रिल और सस्पेंस के साथ एक खास किस्म का सेंस आफ ह्ययूमर, जो कभी-कभी आपको इब्ने सफी के क्लासिक जासूसी उपन्यासों के किरदारों की याद दिला देता है। खास तौर पर यदि आपको आसमां के नीचे, हम आज अपने पीछे... गीत का फिल्मांकन याद हो।


यह तो बात हुई हिन्दी एक क्लासिक सस्पेंस थ्रिलर की। इस दौरान तमाम ऐसी फिल्में भी आईं, जो उस समय के बाजार और सिनेमा उद्योग के रुझान को देखते हुए बहुत साहसिक कहा जाएगा। आज सिनेमा के पास वितरण का बिल्कुल नया सिस्टम है। पहले की तरह नए विषयों को हाथ में लेने पर फ्लाप होने का खतरा नहीं है। उस दौर में अपने प्रयोग को दर्शकों की स्वीकार्यता देने के लिए निर्देशकों को बेहतर कलात्मक संतुलन साधना पड़ता था। इसी संतुलन से निकली हैं राज खोसला की वो कौन थी और मेरा साया जैसी फिल्में। मैंने दोनों ही फिल्में बचपन में देखी थीं। वो कौन थी तो मेरे बिल्कुल समझ मे नहीं आई। तब मैं बहुत छोटा था मगर मुझे कब्रिस्तान के खुलते गेट, कोहरा और बुके लेकर इंतजार करता एक डरावना सा शख्स नहीं भूला। बाद में 17-18 साल का था तो यह फिल्म दोबारा रिलीज हुई और मैंने इस फिर से देखा। मैं हैरान रह गया कि राज खोसला ने जिस तरह से सस्पेंस बनाने के लिए बहुत छोटी-छोटी बातों का सहारा लिया था, वह उन्हें अपनी अवधारणा में कई बार एडगर एलन पो सरीखे लेखकों से जोड़ता है।

मुझे आज भी लगता है कि अगर एडगर एलन पो की कहानियों या फिर आस्कर वाइल्ड की द पिक्चर आफ डोरियन ग्रे या रेबेका उपन्यास के भारतीय संस्करण को फिल्माया जाए तो राज खोसला की शैली सबसे ज्यादा उन अवधारणओं के करीब बैठेगी। राज खोसला सबसे बड़ी खूबी अपने चरित्रों को पर्दे पर एक रहस्यमय किरदार में ढालने में थी। इसके लिए वे बेहद बारीक ताना-बाना बुनते थे। चरित्रों के विकास पर वे कितनी मेहनत करते थे इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनसे जुड़े एक प्रसंग से लगाया जा सकता है। कहते हैं कि फिल्म बंबई का बाबू के एक दृश्य में सुचित्रा सेन चेहरे पर शंका का भाव लाना था। बहुत कोशिश करने पर भी सुचित्रा उस भाव को नहीं प्रकट कर पा रही थीं जो खोसला चाहते थे। आखिर में लाइटिंग के बीच धागे से एक पत्ता बांधा गया। फिल्म में सुचित्रा संवाद बोलते हुए जब आगे बढ़ती हैं तो पत्ते की परछाईं सिर्फ उनकी आंखों पर कुछ सेकेंड के लिए पड़ती है। उसकी कालिमा उनकी शंका को सीधे दर्शकों को सामने रख देती है।


अगर विषय के लिहाज से देखें तो इसी दौर में बीआर चोपड़ा ने धुंध और इत्तेफाक जैसी फिल्म बनाई। इत्तेफाक का खास तौर से जिक्र करना चाहिए, क्योंकि 1969 में रिलीज इस फिल्म में कोई गाना नहीं था और एक सिर्फ एक रात की कहानी थी। देखा जाए तो इस तरह की कुछ और फिल्में उसी दौर में आई थी। इनमें से एक देखने लायक फिल्म है 1974 में प्रदर्शिक छत्तीस घंटे। राजकुमार, सुनील दत्त, रंजीत, माला सिन्हा और डैनी के बेहतर अभिनय से सजी इस फिल्म की कहानी का रियल टाइम सिर्फ छत्तीस घंटे था। यह एक 'होस्टेज मूवी' थी। तीन बदमाश एक घर में जाकर छिप जाते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी थी अमिताभ बच्चन की फिल्म 1963 की फरार में। फरार की स्टोरी लाइन भी कितनी दिलचस्प... एक फरार हत्यारा जा छिपता है एक पुलिस अफसर के घर में। घर में सिर्फ अफसर की पत्नी और उसका बेटा है। हत्यारा दोनों को बंधक बना लेता है और इसके साथ ही एक और वास्तवकिता से रु-ब-रू होता है। अफसर की पत्नी कई साल पहले उसकी प्रेमिका थी।

अमिताभ 1974 की फिल्म बेनाम को कौन भूल सकता है। इसका एक गीत आज भी नहीं भूलता मैं बेनाम हो गया... बेनाम जैसी फिल्मों की खूबी यह थी कि ये थ्रिलर के फॉरमेट में सामाजिक मुद्दों और कई अहम सवालों से टकराती थीं। बेनाम एक मौत के चश्मदीद गवाह और उसको मिलने वाली धमकियों पर है। कुछ इसी तरह की थ्रिलर थी 1973 में आई गुलजार की अचानक। एक सेना अफसर के जीवन पर बिना गानों की इस फिल्म को 'मोस्ट थॉट प्रोवोकिंग एंटी-वार फिल्म' भी कह सकते हैं। संजीव कुमार की 1975 में रिलीज फिल्म उलझन का जिक्र मैं पहले भी अपने ब्लाग में कर चुका हूं। एक एक ऐसे पुलिस अफसर की कहानी है कि जो एक मर्डर केस का इन्वेस्टीगेशन कर रहा है और हत्या दरअसल उसकी पत्नी ने की है... ठीक शादी वाली रात। संजीव कुमार की 1973 में आई अनामिका हास्य और संगीत में पिरोया एक दिलचस्प थ्रिलर है। मैंने इन सभी फिल्मों के साथ उनकी रिलीज का वर्ष दिया है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये एक खास टाइम पीरियड में रिलीज हुई हैं। बीच के एक दौर में थ्रिलर लगभग खत्म हो गए या बहुत खराब फिल्में आईं। हिन्दी की थ्रिलर्स को उनका पुराना गौरव दिलाने का श्रेय सच्चे अर्थों में राम गोपाल वर्मा को जाता है। हालांकि पटकथा के मामले में वे भी मात खा जाते हैं। अभी मैं इनमें से बहुत सी उन फिल्मों का जिक्र नहीं कर पाया हूं जो मैंने नहीं देखीं और काफी पॉपुलर रही हैं। मसलन संजीव कुमार की शिकार और अमिताभ की दो अनजाने और गहरी चाल

Friday 12 June 2009

सुचित्रा फिल्म सोसाइटी


यह असफल सा प्रयास है अपने वर्तमान को अतीत की तरह टटोलने का। यदि बैंगलोर कभी अपना डेरा उठ जाए तो क्या ऐसा होगा जो मेरी स्मृति में बसा रह जाएगा। जाहिर तौर बारिश, बारिश और बारिश। हर शाम क्षितिज से उमड़ते काले बादल और उनमें बिजली कि हल्की कौंध। हवा, हवा और हवा।

...और क्या याद रह जाएगा। पैदल जाती लड़कियां। ढेरों लोग फुटपाथ पर एक ही अंदाज में चलते। गले में झूलता आई कार्ड और कानों में मोबाइल के ईयरफोन, पीठ पर एक बड़ा सा बैग। ठहरी हुई गाड़ियों का अंतहीन रेला। मगर हार्न की आवाज नहीं। क्योंकि बंगलुरु के लोग सड़कों पर लगने वाले जाम के आदी हो चुके हैं। कई बार तो सुबह लगे जाम में जब सभी गाड़ियों के इंजन बंद हो जाते हैं तो चिड़ियों की चहचहाहट भी सुनाई देने लगती है।

कुछ और भी याद रह जाएगा। बनशंकरी की ऊंची-नीची सड़कें। हरितिमा मे खोती हुई। और उन सड़कों से होते हुए एक पुरानी बारिश और जंग खाई इमारत। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी। बीते दो बरस में मेरे लिए बैंगलोर का एक इकलौता एक्सप्लोर है। हम भीड़ से होते हुए कुछ चौड़ी उदास सड़कों की तरफ मुड़ते हैं और नारियल के झुरमुट में छिपी एक इमारत दिखती है।

अपने यूपी के शिक्षा विभाग की याद दिलाता इसका दफ्तर भीतर एक हॉल और उसी में छोटी सी लाइब्रेरी। इमारत के पिछले हिस्से में एक छोटा सा थिएटर बना है। जहां पर महीने में तीन-चार फिल्में दिखाई जाती हैं। इसके बीच एक उजाड़ सा पार्क है। संस्था के संचालकों ने जैसे अपने मानक तय कर रखे हैं। सिनेमा के बाद कई बार उस पर डिस्कशन भी आमंत्रित किए जाते हैं।

सुचित्रा का अपना इतिहास भी है। करीब 30 वर्षों का। इसकी स्थापना के वक्त सत्यजीत रे भी यहां आए थे। सोसाइटी के सदस्यों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। मगर एमएस सथ्यु और गिरीश करसावल्ली भी इसके मेंबर हैं। हर शो के पहले अकसर बाहर चल रही बूंदा-बांदी के बीच चाय या कॉफी और क्रकजैक या मोनेको बिस्कुट मिलते हैं। हर फिल्म शुरु होने से पहले घंटी बजती है और बाहर टहलते, सिगरेट सुलगाते या आपस में कुछ फुसफुसाते लोग भीतर चल पड़ते हैं।

इस छोटे से हॉल के अंधेरे में पहली बार मैं दुनिया के महानतम निर्देशकों से रू-ब-रू हुआ। खास तौर पर इंग्मार बर्गमॅन की तीखी, मन को बेधती उदासी को मैंने इसी हॉल के अंधेरे में जाना। बड़े पर्दे पर बर्गमन की श्याम-श्वेत छवियों को देखना। उनके कलाकारों के असाधारण क्लोज-अप। या फिर फ्रांसुआ त्रुफो की दुविधा से भरी दुनिया। या फिर गोदार की एब्सर्डिटी। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी मुझे सिर्फ इसलिए याद रह जाएगी कि उम्र के उस दौर में जब चीजों के प्रति आप उदासीन होने लगते हैं मैं किसी किशोर जैसी उत्सुकता और धुकधुकी लेकर गया।

यहां दिखाई जाने वाली इन महान फिल्मों का इसके वातावरण से जैसे गहरा संबंध है। शायद यह एहसास मल्टीप्लेक्स मे जाकर उन्हीं फिल्मों को देखने से नहीं होगा। आप भीतर जाते हैं तो एक अकेलेपन के साथ। सुचित्रा फिल्म सोसाइटी मे देखी गई हर फिल्म मेरे भीतर 'घटित' हुई है। बारिश, हरियाली, बहती हवा और थिएटर के अंधेरे में 'लिखी' गई कहानियां जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। प्रोजेक्टर की कांपती सफेद रोशनी से मन के अंधेरे में दमकती यादें... लेकिन अभी तो मैं बैगलोर में हूं और यादें वोडाफोन के जू-जू की तरह भविष्य की देहलीज पर इंतजार कर रही हैं...
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